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आखिर क्यों DRS लेने के मामले में अधिकतर गलत साबित होती है भारतीय टीम

भारतीय क्रिकेट टीम में जब तक महेंद्र सिंह धोनी एक कप्तान के तौर पर या खिलाड़ी के तौर पर टीम के साथ थे, तो सबसे बड़ी मदद गेंदबाजों को जो फैसला लेने में होती थी, वह यह कि अंपयार के फैसले के खिलाफ डिसीजन रिव्यू सिस्टम (DRS) का उपयोग करना है या नहीं। धोनी जिस सटीक अंदाज में DRS लेने का फैसला करते थे, उससे अंपायर को भी एहसास हो जाता था कि वह कहीं ना कहीं गलत है।

हालांकि, धोनी के अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद अब DRS लेने पर काफी चर्चा देखने को मिलती है और इसके बावजूद टीम कई बार अपने फैसले पर गलत साबित हो जाती है। वनडे और टी-20 क्रिकेट से ज्यादा DRS की अहमियत टेस्ट क्रिकेट में देखने को मिलती है, जहां पर एक फैसले से पूरे मैच का रुख तक पलट जाता है।

DRS लेने के मामले में मौजूदा भारतीय कप्तान विराट कोहली का कोई खास अच्छा रिकॉर्ड नहीं है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह यह है कि वह गेंदबाज की मांग पर फैसला कर लेते हैं जिससे कई मौकों पर यह फैसला पूरी तरह से गलत साबित होते हुए देखा गया है। हाल में ही ऐसा कई बार इंग्लैंड के खिलाफ 5 टेस्ट मैचों की सीरीज के शुरुआती 2 मैचों में देखने को मिला।

इंग्लैंड के खिलाफ लगातार 2 DRS खराब हुए थे

कोरोना महामारी के चलते आईसीसी ने टेस्ट क्रिकेट में न्यूट्रल अंपायर नहीं होने के कारण प्रत्येक पारी में मिलने वाले DRS के मौके को बढ़ाकर 3 कर दिया। यह ऐसे मौके होते हैं, जहां से कई बार कोई भी टीम पूरे मैच का पासा तक पलट देती है। इंग्लैंड के खिलाफ पहले टेस्ट मैच के दौरान मोहम्मद सिराज ने कप्तान विराट कोहली पर दबाव डालते हुए 2 DRS लेकर उसे खराब कर दिया, जबकि यह साफ तौर पर सभी को दिख रहा था कि गेंद पूरी तरह से ऑफ स्टंप के बाहर पिच हुई है।

हालांकि, यह पहला मौका नहीं था और ऐसा कई बार देखने को मिला है जब कोहली एक कप्तान के तौर पर DRS लेने के मामले में गलत साबित हुए हैं। जहां कई टीमों के कप्तान इन मौकों को काफी बेहतर तरीके से उपयोग करते हुए दिखाई देते हैं, तो वहीं कोहली इस मामले में काफी पीछे दिखाई दे रहे हैं।

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